ॐ जय जगदीश हरे | Om Jai Jagdish Hare Aarti PDF in Hindi

Om Jai Jagdish Hare Aarti PDF के माध्यम से हम भगवान की प्रतिमा के सामने ज्योति जलाने और उन्हें भजन करने की एक प्रमुख प्राथना गीत है। दोस्तों आप सब ने अपने जीवन में ॐ जय जगदीश हरे की आरती कभी न कभी सुनी होगी। लेकिन आपको ये नहीं पता होगा कि ये आरती किसने लिखी है, और किसने गायी हुई है। इस लेख में हम श्री “ॐ जय जगदीश हरे” आरती के महत्व, श्लोक, और लाभ को जानेंगे।

यह एक ऐसी आरती है जो कि शास्त्रों में जिर्क नहीं किया गया है। लेकिन इसके बाद भी ये आरती हिन्दू धर्म में हर जगह की जाती है। यह आरती लिखने वाले पंडित श्रद्धा राम शर्मा है । २४ जून १९८१ को पंडित श्रद्धा राम शर्मा की लाहौर में मृत्यु हो गयी थी। इनका जनम जालंधर जिले के लुधियाना के पास फिलोरे नाम के गांव में हुआ था। ऐसा कहते है कि पंडित जी स्वत्रंता सेनानी, हिंदी साहित्यकारक और, सनातन धर्म प्रचारक भी रहे थे।

ॐ जय जगदीश हरे के पाठ

यह आरती भगवान विष्णु की महानतम आराधनाओं में से एक है और उन्हें समस्त दुखों से मुक्ति प्रदान करने में समर्थ है। Om Jai Jagdish Hare Aarti भगवान कृष्ण की आराधना है, जिनका एक मात्र अवतार विष्णु के रूप में है। इस आरती के पठन से हमारा मन और आत्मा शुद्ध होते हैं और हम भगवान के प्रति अपने सच्चे प्रेम का अनुभव करते हैं।

Om Jai Jagdish Hare Aarti PDF
Om Jai Jagdish Hare Aarti

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Om Jai Jagdish Hare Aarti (Hindi)

ओम जय जगदीश हरे, स्वामी! जय जगदीश हरे।
भक्त जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥ ओम जय जगदीश हरे।

इसका अर्थ आरती श्री जगदीश्वर की जगत के ईश्वर की ओम यह ब्रह्मनाद होता है ओम के बारे में कहा जाता है कि जो संपूर्ण ब्रह्मांड है इसकी उत्पत्ति जब हुई है तो जो नाद उत्पन्न हुआ है जो धनिया उत्तम हुई है वह ओम है तो यह ब्रह्म स्वरुप को युद्ध करता है उसको बताता है । ओम फिर घुम अ ब्रह्मा विष्णु हेश ॐ जप लिखते हैं तो तीन इसमें शब्द आते हैं जो ब्रह्मा विष्णु महेश के द्योतक हैं ऐसा भी बोला जाता है ।

यह एक परमपिता परमेश्वर का नाद है ॐ जय जय जयकारा कर रहे हैं किसकी जगत के इश्क की जिन्होंने भी इस जगत की रचना की है जो इस जगत के पालनहार है जो इस जगत के राजा है जो इस जगत के स्वामी हैं ना उनकी जय-जयकार कर रहे हैं कौन हरी-हरी कौन विष्णु भगवान जिनको आप बोलते हैं विष्णु जी की आरती है कृष्ण जी स्वामी की जय जगदीश हरे आप हमारे स्वामी है।

अब हमारे पालन कार्य पालन करने वाले हैं भक्त जनों के संकट भक्त लोगों के संगठन का मतलब होता है लोग हैं जनगणमन तो जनता मतलब जो लोग हैं । इस गणतंत्र के जो लोग हैं तो भक्त जनों के संकट उनके ऊपर जो संकट आते रहते हैं जीवन में अनेक प्रकार की विपत्ति आती रहती हैं पैसे से स्वास्थ्य से अपने संबंधों में संकट उत्पन्न हो जाते हैं ।

कई बार तो कि वह क्षण में दूर करें बहुत ही कम समय में धन का मतलब होता है सेकंड समझ लीजिए अ कि भगवान के पास इतनी पॉवर है जिन्होंने इस धरती को बनाया है वे चाहे तो कुछ भी कर सकते हैं सर्वस्व है वह तो वह भगवान जो है वह भक्तों के संकट तुरंत ही दूर कर देते हैं जो दावे जो भगवान का ध्यान करते हैं 

जो ध्यावे फल पावे, दुःख विनसे मन का। स्वामी दुःख विनसे मन का।
सुख सम्पत्ति घर आवे, कष्ट मिटे तन का॥ ओम जय जगदीश हरे।

तन मन से ध्यान करने से उनको फल जरूर मिलता है फल प्राप्त होता है पाना उनको उसका फल जरूर प्राप्त होता है दुख बिनसे मन का जो मन में उनके जो भी दुख है वह उनका हट जाता है चला जाता है। मन का दुख बिना देखे मन हो जाता है सुख-संपत्ति घर आवे कि यह तो हम चाहते ही है हर कोई चाहता है कि खूब सारा धन मिल जाए संपत्ति मिल जाए संपत्ति भी धन भी होती है संपत्ति अचल संपत्ति भी होती है जैसे कि आपका घर है आपका कोई प्लॉट है ना कोई आपका बहुत अच्छा वाहन है कोई आपके पास अच्छा ज्ञान है यह सब चीजें संपत्ति में गिनी जाती हैं ।

ध्वनि संपत्ति कि लक्ष्मी जिसको आप बोलते ना लक्ष्मी बहुत प्रकार की होती है धन लक्ष्मी वैभव लक्ष्मी व्रत का ज्ञान लक्ष्मी तो सुख और संपत्ति घर आती है कष्ट मिटे तन का तन का मतलब होता है। शरीर का जो कष्ट है शरीर का कष्ट शरीर में नाना प्रकार के कष्ट उत्पन्न हो जाते हैं। अनशन खाने से और कई दुर्घटना हो गई कुछ हो गया तो सुख संपत्ति घर आती है और हमारे शरीर का भी अगर कोई कष्ट है वह भी दूर हो जाता है ।

मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूं मैं किसकी। स्वामी शरण गहूं मैं किसकी।
तुम बिन और न दूजा, आस करूं जिसकी॥ ओम जय जगदीश हरे।

मात पिता तुम मेरे जिस प्रकार माता और पिता अपनी संतान का पालन पोषण करते हैं उसकी बचपन से जन्म से लेकर के मां का जो रूप है इसीलिए देवताओं का रूप माना गया है क्योंकि जन्म से पहली सांस से वह अपने शिशु को अपनी संतान का पालन पोषण करती है पिता विचार धूप में गर्मी में नाना प्रकार की परेशानियां झेलते हुए पैसा कमा कर लाते हैं जिससे घर परिवार चलता है तो माता और पिता का दोनों को देवता का रूप माना गया है

मात पिता तुम मेरे आप मेरे जो है माता और पिता है मेरे पालन करता है मेरे रक्षक है माता-पिता का कर्तव्य भी होता है बच्चों की रक्षा करना बच्चों को सही ज्ञान देना शिक्षा देना उनका पालन-पोषण करके उनको योग्य बनाना शरण गहूं मैं किसकी शरण कहना चेहरा मतलब मैं जाना है कि आपके अलावा में किसकी शरण में जाऊं आप मेरे माता और पिता है आप मेरे नाथ है व बच्चों के माता-पिता खत्म हो जाते हैं तो उन बच्चों को अनाथ बोला जाता है ये तो ईश्वर कैसे मात पिता है

मैं आपके अलावा किसकी शरण में जाऊं किसकी शरण में जाकर गुहार लगाओ कि तुम बिन और न दूजा आपके बिना कोई और दूसरा नहीं है सिर्फ वन एंड ओनली वन केवल आप हो आपके अलावा कोई दूसरा नहीं है आर्स आशा करना करूं मैं जिसकी जिससे मैं आशा करूं है प्रभु है परमेश्वर है विष्णु जी आप ही मेरे माता-पिता और सब कुछ हो आपके अलावा में किसी और के पास नहीं जाऊंगा मैं जिससे कुछ आशा करूं ऐसा कोई भी नहीं है

तुम पूरण परमात्मा, तुम अन्तर्यामी।स्वामी तुम अन्तर्यामी।
पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सबके स्वामी॥ ओम जय जगदीश हरे।

तुम पूर्ण परमात्मा आप जो है वह पूर्ण परम आत्मा कि मैंने अपने कई वीडियोस में आपको बतलाया है कि धरती में अनेक जीव जंतु उसके बाद में धरती के बाद में सोलार सिस्टम सौरमंडल सौरमंडल के जैसे करोड़ों करोड़ों अरबों खरबो सौरमंडल इस आकाशगंगा में है इसको मां आकाशगंगा को गैलेक्सी बोलते हैं हमारी गैलेक्सी का नाम है मिल्की वेब और ऐसी अरबु खरबू गैलेक्सी इस ब्रह्मांड में मौजूद है यह जो पूरा ब्रह्मांड है यह हमारी पहुंच से बिल्कुल भी पहुंच में नहीं बिल्कुल बाहर है हम सोच भी नहीं सकते सबसे छोटी संरचना जो भी हमको ज्ञात हुई है

वह परमाणुओं उस समय हमारी पहुंचने यह पूरी तरीके से और ब्रह्मांड केवल हमारी गैलेक्सी में ही लाइट को एक एंड से दूसरे दिन तक आने में 2 लाख साल लग जाते हैं और ऐसी अरबों-खरबों गैलेक्सी सी आकाशगंगा इस ब्रह्मांड में मौजूद है तो जिन्होंने भी यह बनाया है वह परम आत्मा उसको हम कि वह बोलता है उनको हम ब्रह्म बोलते हैं कि इस ब्रह्मांड के रचयिता ब्रह्मांड से ब्रह्म है हैं और अब तो ऐसा भी कांसेप्ट है कि ब्रह्मांड भी एक नहीं है यूनिवर्स नहीं है और ऐसे अनेक को ब्रह्मांड हो सकते हैं मल्टी वर्ष है वो तो परमब्रह्म ब्रह्म से भी ऊपर एक और कैटिगिरिया गई है

परमब्रह्म है ए परम भ्रम भ्रम भ्रम भ्रम के अंदर में ब्रह्म है ब्रह्म के अंदर में देवी-देवता लोग आते हैं भगवान जी को हम बोलते हैं भगवान के नीचे फिर मनुष्य वगैरह आते हैं पशु पक्षी आते हैं सारी सृष्टि आती है तो आप जो है वह फुल पूर्ण परमात्मा के रूप में है तुम अंतर्यामी अंतर्यामी का मतलब होता है अंतर्मन की बातों को जानने वाला जो हमारे मन की बातें समझ ले जान लें ऐसी विद्या होती है मैंने खुद देखिए है कई ऐसे लोग हैं जो आपके मन में क्या चल रहा है दिमाग में क्या चल रहा है वह सब जान लेते हैं हे प्रभु आप तो अंतर्यामी है

पार ब्रह्म देखिए गया परम ब्रह्म का जो मैं आपको सिर्फ बता रहा था मेरे परमब्रह्म है आप परमेश्वर हैं आप परम का मतलब होता सर्वस्व हाईएस्ट डिग्री परम इससे ऊपर और कुछ भी नहीं परमेश्वर है आप तुम सब के स्वामी आप जो है वह सब के स्वामी है स्वामी अपने अंडर में अपने नीचे कई लोगों को रखता है और उनको जो इंस्ट्रक्शन देता है जैसे रखता है सबको रहना पड़ता है स्वामी स्वामी के नीचे कौन होता है सेवक

तो हम कौन हैं हम ईश्वर के सेवक हैं दास जी कि दास मी बोला जाता है कि इनके अंदर में तो स्वामी ऑर्डर देने वाला मैं अपनी बात मनवाने वाला अपने अनुसार करवाने वाला और कौन करता है सेवक लोग करते हैं और दास लोग करते हैं तो हे परमपिता परमात्मा आप परमेश्वर हैं आप परम ब्रह्म है विष्णु जी के बारे में बोला जा रहा है

तुम करुणा के सागर, तुम पालन-कर्ता। स्वामी तुम पालन-कर्ता।
मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता॥ ओम जय जगदीश हरे।

तुम करुणा के सागर आप करुणा के सागर है अथाह करुणा आप में भरी पड़ी है जितना सागर में पानी है अपना अपनी सकते ऐसे ही ईश्वर के अंदर करुणा है ईश्वर करुणा करते हैं मस्ती करते हैं हमारे ऊपर ममता करते हैं हमारी गलतियों को क्षमा कर देते हैं तुम पालनकर्ता आप पालन करता है आप ही सृष्टि को पालते हैं कैसे जीवन यापन होगा कैसे जीवन चलेगा भरण-पोषण होगा आप पालन करता है मैं सेवक तुम स्वामी देखिए आ गया कांसेप्ट मैं सेवक हूं और कि मेरे स्वामी है कृपा करो भर्ता

आप मेरे ऊपर अपनी कृपा करिए भरण-पोषण करने वाले भरता आप अपनी कृपा मुझ पर अवश्य करिए कि तुम हो एक अगोचर गुर्जर गुर्जर का मतलब होता है दिखाई देने वाला है आप जो हमको दिखाई दें उसको बोलते हैं गोचर में दिखाई देने वाला अगोचर का मतलब होता है आप दिखाई नहीं देते मैं परम पिता परमात्मा जिन्होंने इस सृष्टि की रचना की है परम ब्रह्म परमात्मा किस रूप में है कैसे दिखते हैं मनुष्य के रूप में है कि किसी और रूप में है उनकी आवाज कैसी है

उनका स्वरूप कैसा है उनका रंग कैसा है नोबडी नोज किसी को नहीं मालूम है इसी को उनके स्वरूप के बारे में नहीं मालूम है और कल्पना भी हम नहीं कर सकते हैं इसलिए उनको बोलता है निराकार निर्गुण आकार जिनका आकार भी हम नहीं जानते निराकार है एक अगोचर आप दिखाई नहीं देते

तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति। स्वामी सबके प्राणपति।
किस विधि मिलूं दयामय, तुमको मैं कुमति॥ ओम जय जगदीश हरे।

तुम हो एक अगोचर सबके प्राणपति सभी के प्राणों के रफ पति हैं मतलब अधिष्ठाता है पति का मतलब होता है पालन करने वाला अधिष्ठाता सो आप सब के प्राणों आप जब चाहे जिसको उठा लें इसका जीवन और जीवन खत्म कर दे जिसको चाहे तो जीवन दे दें किस विधि मिलूं दयामय हे दयामई हे तयार करने वाले प्रभु मैं आपको किस तरह से मिल लूं किस तरह से मिलो मेरे अंदर तो कोई योग्यता नहीं है मेरे अंदर कोई भी ऐसा गुण नहीं है

मैंने ऐसा कोई कर्म नहीं किया जिससे मैं योग्य बन जाओ कि मैं आपसे मिलने का हाथ करूं किस तरह से मिलो तुमको मैं कुमति मेरी बुद्धि भी अच्छी नहीं है मैं कुमति हूं मती का मतलब होता है बृद्धि आई ने मति का मतलब है बुद्धि और कुंभ का मतलब बताएं दुग्ध ई ई कि दुग्ध यापन बोलते हैं जिसको जिसकी बुद्धि सही नहीं होती अल्प अवधि में होता है कम यानि अल्प ज्ञानी जिसको बोला जाता है जानता ही नहीं है मैं तो कुछ भी नहीं और हकीकत भी यही है

उस परमपिता परमात्मा के स्वरूप के बारे में आज तक कोई भी पता नहीं कर पाया सिर्फ हम कह सकते हैं जिन्होंने सृष्टि की रचना की है कल्पना से परे है कल्पना से परे है तो मैं तो उम्मती हूं अल्प ज्ञानी हो मेरी मति बिल्कुल भी ठीक नहीं है मैं किस तरह से आप से मिल पाऊं

दीनबन्धु दुखहर्ता, तुम ठाकुर मेरे। स्वामी तुम ठाकुर मेरे।
अपने हाथ उठा‌ओ, द्वार पड़ा तेरे॥ ओम जय जगदीश हरे।

दीन बंधु दुख हर्ता आप दिनों के बंधु है बंधु मतलब भाई हैं दिन का मतलब होता है जो असहाय होते हैं जो चलने चल नहीं पाते देख नहीं पाते सुन नहीं पाते दीन-हीन दिन का मतलब होता है असहाय जिनके पास धन नहीं है गरीब है वहीं अवस्था कहलाती है आप उन लोगों के बंधु हैं उन लोगों के भाई हैं उनके रक्षक हैं दुख को हरने वाले हैं दुखहर्ता तुम रक्षक मेरे आप मेरी रक्षा करने वाले हैं अपने हाथ उठाओ द्वार पड़ा तेरे मैं आपके द्वार पर पड़ा हुआ हूं आपकी शरण में पड़ा हुआ हो अपने हाथ उठाओ और मुझको अपना लो इसका मतलब यह हुआ कि अपने हाथ बड़ा करके आप मेरे न तो आपके द्वार पर पड़ा हुआ हूं आपके दरवाजे पर पड़ा हुआ इसको अपना लो

विषय-विकार मिटा‌ओ, पाप हरो देवा। स्वमी पाप हरो देवा।
श्रद्धा-भक्ति बढ़ा‌ओ, संतन की सेवा॥ ओम जय जगदीश हरे।

विषय विकार मिटाओ जो विषय में विकार है मन में लालच आ जाता है क्रोध आ जाता है जलन होती है किसी की सफलता देखकर के मन में पूर्ण होती है किसी को आगे बढ़ते देख करके यह विकार माने गए हैं इनको मन के लिए शरीर के लिए अच्छा नहीं माना जाता है तो है ईश्वर ने जब दुनिया बनाई तो यह विकार मन में डाल दिए और विषयों के प्रति धन के प्रति लोगों के प्रति आसक्ति जो है उसको आप मिठाई ए गलत प्रकार के जो विकार है विषय के प्रति उनको आप मिटाइए उनको आप मिटाइए पाप हरो देवा मेरे जो मेरे से जो पाप हो गए हैं उनका भी हरण करिए हे देवता हुआ है कि श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ मेरे मन में आपके प्रति संसार के अच्छे लोगों के प्रति श्रद्धा और भक्ति श्रद्धा का मतलब होता है

भक्तिपूर्वक मन में विनयपूर्वक जो एक हमारे मन में विनय भाव आता है उसको श्रद्धा कहते हैं और भक्ति का मतलब होता है ईश्वर परमपिता परमात्मा की सत्ता को स्वीकार करते हुए जो एक अनुग्रह भाव हमारे मन में आता है वह भक्ति होती है भक्तों का मतलब होता है सर्वस्व मानने वाला भक्त बढ़ाओ मेरे मन में अच्छी चीजों को बढ़ाओ संतन की सेवा जो संत लोग हैं

श्री जगदीशजी की आरती, जो कोई नर गावे। स्वामी जो कोई नर गावे।
कहत शिवानन्द स्वामी, सुख संपत्ति पावे॥ ओम जय जगदीश हरे।

मैं उनकी सेवा कर सकूं ओं में अच्छे लोगों को मैं सेवा उनकी सेवाधारी कर सको उनके शरण में जा सको मैं तन मन धन सब कुछ है तेरा जो मेरे को शरीर मिला है जो रे मेरा मन मन है मन में जो भावनाएं जाती है और जो मेरे पास भी संपत्ति है धन है वह सब आप का दिया हुआ है आप ही का है स्वामी सब कुछ है तेरा हर चीज जो मेरे पास है वह मूलरूप से आपकी ही दी हुई है आपकी ही है तेरा तुझको अर्पण आपने जो मुझको दिया है वह सब मैं आपको अर्पित करता हूं आपको देता हूं

क्या लागे मेरा इसमें मेरा क्या है मेरा तो कुछ भी नहीं है मेरा जीवन ही आपका दिया हुआ है मेरा सब कुछ आपका दिया हुआ है यह सब मैं आपको अर्पण करता हूं आपको देता हूं इसमें मेरा कुछ भी नहीं है अंत में फिर से इसी रिपीटीशन हो गया ओम जय जगदीश हरे स्वामी जय जगदीश हरे भक्त जनों के संकट क्षण में दूर करे

भगवान विष्णु की आरती, उनकी स्तुति की गई उनका गुणगान किया गया है जगदीश का मतलब जगत के इस पूरे जगत के जो स्वामी है जिन्होंने इसकी रचना की है इसके पालन करता है भगवान विष्णु ने उनकी आरती आज हमने देखी है

श्री “ॐ जय जगदीश हरे” आरती के लाभ

Om Jai Jagdish Hare Aarti PDF का नियमित पाठ करने से भक्तों को विशेष लाभ होते हैं। इसके पठन से भक्त का मन प्रेम और भक्ति से भर जाता है और उसके जीवन में भगवान के प्रति अटूट प्रेम की भावना उत्पन्न होती है। यह आरती भक्त के द्वारा प्रेम और श्रद्धा से पढ़ी जाती है और इसे पढ़ने से भक्त को भगवान के सभी संकटों से मुक्ति मिलती है।

Om Jai Jagdish Hare Aarti PDF का पाठ करने से भक्त को मन की शांति और आत्मिक शक्ति मिलती है। भक्त इस आरती के माध्यम से भगवान की प्रति अपनी भावना को प्रकट करते हैं और उन्हें भगवान के प्रति अधिक समर्पित होने का आनंद मिलता है। इसके पठन से भक्त का मानसिक और आत्मिक विकास होता है और उसके जीवन में सुख और समृद्धि का आनंद मिलता है।

समाप्ति

इस आरती का पठन हमें भगवान के प्रति विश्वास, समर्पण, और निष्ठा का अनुभव करते हैं। हम उनके प्रति अपने मन की गहराई से श्रद्धा रखते हैं और उनके समीप होने का आनंद महसूस करते हैं। इस आरती का पठन हमारे मन में चिन्हित करता है कि हम सभी कुछ भगवान के हाथों में समर्पित कर देते हैं और उनके मार्ग पर चलते हैं।

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Om Jai Jagdish Hare Aarti PDF : Download

आशा करते हैं कि आपको यह ब्लॉग पोस्ट पसंद आयी होगी और आप भगवान विष्णु के प्रति अपनी भक्ति और समर्पण को बढ़ाने के लिए इस आरती का पाठ करेंगे। धन्यवाद।

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